सोना देवी विश्वविद्यालय, घाटशिला के स्वामी विवेकानंद सभागार में राष्ट्रीय युवा दिवस के पावन अवसर पर भारत के महान संन्यासी, दार्शनिक, राष्ट्रचिंतक एवं युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद की जयंती श्रद्धा, गरिमा एवं बौद्धिक गंभीरता के साथ मनाई गई। इस आयोजन का उद्देश्य युवाओं में आत्मविश्वास, नैतिक मूल्यों, राष्ट्रप्रेम, सांस्कृतिक चेतना एवं कर्तव्यबोध को जागृत करना रहा।
कार्यक्रम का मंच संचालन संस्कृत विभाग की सहायक प्राध्यापक सुश्री कुमारी निकिता ने अत्यंत प्रभावशाली, ओजस्वी एवं सुव्यवस्थित ढंग से किया। उनके कुशल संचालन ने कार्यक्रम को अनुशासन, स्पष्टता और गरिमा प्रदान की। कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ पुष्पांजलि अर्पण एवं दीप प्रज्वलन द्वारा हुआ, जिससे सभागार आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मक चेतना से परिपूर्ण हो उठा।
इस अवसर पर संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ० सुजीत कुमार ने स्वामी विवेकानंद के जीवन एवं दर्शन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उनके प्रेरक और मोटिवेशनल विचारों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद का जीवन युवाओं के लिए आत्मविश्वास, आत्मानुशासन, सेवा-भाव और निर्भीक चिंतन की अनुपम मिसाल है।
इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ० कंचन सिन्हा ने स्वामी विवेकानंद की शिक्षा-दृष्टि पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, नैतिक विकास और राष्ट्रसेवा की भावना का विकास है। उन्होंने स्वामी जी की शिक्षा-दृष्टि को आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक बताया।
कार्यक्रम को सांस्कृतिक ऊँचाई प्रदान करते हुए गणित विभागाध्यक्ष श्री कृष्णेंदु दत्ता ने स्वामी विवेकानंद के प्रिय रवीन्द्र संगीत का भावपूर्ण गायन प्रस्तुत किया, जिसे श्रोताओं ने भावविभोर होकर सराहा।
राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ० शिवचंद झा ने स्वामी विवेकानंद के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 21वीं सदी में जब भारत विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष, अर्थव्यवस्था और वैश्विक मंच पर नई ऊँचाइयाँ छू रहा है, तब स्वामी विवेकानंद के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिकता और परंपरा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं। उन्होंने युवाओं से स्वामी विवेकानंद के आत्मनिर्भर, चरित्रवान और सांस्कृतिक रूप से गौरवशाली भारत के स्वप्न को साकार करने का आह्वान किया।
बंगला विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ० धरणी महतो ने स्वामी विवेकानंद के संघर्षपूर्ण जीवन और साधना पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कठिन परिस्थितियों में भी उनका आत्मविश्वास और संकल्प अडिग रहा, जो युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।
कुलसचिव डॉ० नीत नयना ने कहा कि स्वामी विवेकानंद के विचार आज भी युवाओं को सकारात्मक सोच, कर्मनिष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ते हैं। विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि सजग, संस्कारवान और राष्ट्रहित में सोचने वाले नागरिकों का निर्माण करना है।
माननीय कुलपति प्रो० (डॉ०) ब्रज मोहन पट पिंगुवा ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्रीय युवा दिवस आत्ममंथन, आत्मनिर्माण और आत्मविकास का अवसर है। यदि युवा स्वामी विवेकानंद के विचारों को आत्मसात करें, तो भारत भौतिक प्रगति के साथ-साथ नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी सशक्त बनेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलाधिपति श्री प्रभाकर सिंह ने स्वामी विवेकानंद के समग्र व्यक्तित्व एवं बहुआयामी कृतित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने एक ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन की समुद्री यात्रा के दौरान स्वामी विवेकानंद और जमशेदजी नसरवानजी टाटा के बीच हुई विचार-विमर्श ने आगे चलकर टाटानगर में टाटा स्टील की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। यह प्रसंग राष्ट्रनिर्माण में स्वामी विवेकानंद की दूरदर्शिता और अप्रत्यक्ष योगदान को रेखांकित करता है।
कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के सभी संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। कार्यक्रम ने युवाओं में नई ऊर्जा, आत्मविश्वास, राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक गौरव की भावना का सशक्त संचार किया।