पश्चिम बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय की ताज़ातरीन कार्रवाई ने न केवल चुनावी सूबे, बल्कि समूचे देश में हड़कंप मचा दिया है। I-PAC के निर्देशक प्रतीक जैन के घर और दफ्तर पर बीते कल यानी गुरुवार को प्रवर्तन निदेशालय (ED) छापेमारी के लिए पहुंची।
लेकिन इसके कुछ देर बाद ही राज्य की सीएम ममता बनर्जी का काफिला I-PAC के ऑफिस पहुंचा। जहां से वह फाइल्स और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस अपने साथ ले गईं।
इस मुद्दे पर जमकर हंगामा हुआ। ईडी ने कार्रवाई में दखल देने और सुबूतों को चुराने का आरोप लगाया तो ममता बनर्जी ने ED पर चुनावी रणनीति और इलेक्शन डेटा चुराने का आरोप लगाया। दोनों ही पक्षों ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जहां आज हंगामे के चलते सुनवाई 14 जनवरी तक के लिए टाल दी गई।
ED एक्शन के बीच उमड़े कई सवाल
इस सियासी और दुनियावी बखेड़े की बीच सभी के जेहन में कुछ सवाल उमड़ रहे हैं। उनमें सबसे अव्वल यह है कि ED क्या है और कैसे काम करती है? यह केन्द्रीय एजेंसी इतनी ताकतवर कैसे है? वो कानून कौन से हैं जो इसे अथाह शक्तियां प्रदान करते हैं? सबसे अहम और आखिरी सवाल कि इस मामले में ममता बनर्जी के साथ क्या होगा
कब और क्यों किया गया ED का गठन
प्रवर्तन निदेशालय (ED) का इतिहास भारत की आजादी के पहले दशक से जुड़ा है। इसका गठन 1 मई, 1956 को किया गया था। उस समय इसे ‘प्रवर्तन इकाई’ (Enforcement Unit) के नाम से जाना जाता था। इसकी स्थापना वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग के तहत की गई थी। एक साल बाद 1957 में इसका नाम बदलकर प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) कर दिया गया।
उस दौर में इसका मुख्य काम ‘विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947’ (FERA – फेरा) के तहत विनिमय नियंत्रण कानूनों के उल्लंघन को रोकना था। आसान शब्दों में कहें तो, इसका काम यह देखना था कि देश से विदेशी मुद्रा बाहर न जाए और विदेशी मुद्रा से जुड़े कानूनों का पालन हो। तब तक ED को इतना गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था।कैसे दो शहरों से देशभर में फैला जाल...
शुरुआत में बॉम्बे और कलकत्ता (अब मुंबई और कोलकाता) में ही इसके दफ्तर थे। लेकिन आज इसका जाल पूरे देश में फैल चुका है। साल 1960 में इसके प्रशासनिक नियंत्रण को आर्थिक मामलों के विभाग से राजस्व विभाग में स्थानांतरित कर दिया गया, और तब से यह इसी विभाग का हिस्सा है। यहां से इसकी शक्तियों में थोड़ा सा इजाफा हो गया।
अटल सरकार ने ED को दिया ब्रह्मास्त्र
साल 1999 की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम 1999 (FEMA) पारित किया। इस कानून ने ED के आधार को और मजूबत किया। लेकिन अब भी वह इतनी पॉवरफुल नहीं थी कि सियासी रसूखदारों पर सीधी कार्रवाई कर सके। लेकिन 3 साल बाद ही सरकार ने ‘धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA)’ पारित करते हुए ED को ‘ब्रह्मास्त्र’ दे दिया।
PMLA क्यों बनाता ED को सुपरपॉवर
ED के सामने इकबालिया बयान: यह ED की सबसे बड़ी ताकत है। सामान्य पुलिस केस में, पुलिस के सामने दिया गया आरोपी का बयान कोर्ट में सबूत नहीं माना जाता। लेकिन PMLA की धारा 50 के तहत, ED अधिकारी के सामने दिया गया बयान कोर्ट में सबूत (Admissible Evidence) माना जाता है। यानी, अगर आरोपी ने पूछताछ में गुनाह कबूल कर लिया, तो वह कोर्ट में उसके खिलाफ इस्तेमाल होगा।
संपत्ति जब्त करने का अधिकार: ED के पास किसी भी ऐसी संपत्ति को अटैच (कुर्क) करने का अधिकार है, जिसके बारे में उसे संदेह है कि वह अपराध की कमाई (Proceeds of Crime) से बनाई गई है। खास बात यह है कि संपत्ति जब्त करने के लिए ED को कोर्ट में दोष साबित होने का इंतजार नहीं करना पड़ता। जांच के दौरान ही संपत्ति जब्त की जा सकती है।
गिरफ्तारी का अधिकार और जमानत
PMLA के तहत ED को गिरफ्तारी के व्यापक अधिकार मिले हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि PMLA के मामलों में जमानत मिलना बेहद मुश्किल होता है। इसमें दो शर्तें लागू होती हैं। पहली यह कि पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को जमानत का विरोध करने का मौका मिलना चाहिए। दूसरी यह कि कोर्ट को यह विश्वास होना चाहिए कि आरोपी निर्दोष है और जमानत पर रिहा होकर वह अपराध नहीं करेगा।
आपने कई बार यह देखा होगा कि ED अधिकारियों के शिकंजे में फंसे बड़े-बड़े मंत्री और नेता महीनों ही नहीं, बल्कि सालों तक जेल में रहते हैं। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंदे केजरीवाल को आबकारी नीति से जुड़े धन शोधन यानी मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में ED ने 21 मार्च 2024 को गिरफ्तार किया था। तमाम कानूनी दांवपेंच के बावजूद उन्हें 12 जुलाई को इस मामले में जमानत मिल सकती थी।
आरोपी के ऊपर सबूत का बोझ: आम* आम आपराधिक मामलों में ‘निर्दोष जब तक कि दोषी साबित न हो’ (Innocent until proven guilty) का सिद्धांत चलता है और जांच एजेंसी को दोष साबित करना होता है। लेकिन PMLA के कुछ मामलों में ‘बर्डन ऑफ प्रूफ’ आरोपी पर होता है। यानी आरोपी को यह साबित करना पड़ता है कि उसका पैसा या संपत्ति वैध (White Money) है, न कि अवैध।
प्रवर्तन निदेशालय की शक्ति का विकास (इन्फोग्राफिक- AI)
2018 में मिल गई एक और बड़ी ताकत
साल 2018 में केंद्र की मोदी सरकार ने एक और कानून ‘भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 (FEOA) पारित किया। जिसका उद्देश आर्थिक अपराधियों को देश से भागने से रोकना था। इस कानून के तहत भगोड़े आर्थिक अपराधियों की संपत्तियों को जब्त करने की शक्ति भी मिल गई।
खुफिया एजेंसी की तरह करती है काम*म
ED एक खुफिया एजेंसी की तरह भी काम करती है और एक जांच एजेंसी की तरह भी। इसके काम करने का तरीका पुलिस या सीबीआई से थोड़ा अलग है। यह खुद सीधे तौर पर कोई FIR नहीं दर्ज करती है। लेकिन पुलिस या सीबीआई अगर कोई भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी या तस्करी का केस दर्ज करती है तो ED उस मामले का संज्ञान लेते हुए अपनी रिपोर्ट खुद दर्ज करती है। इस रिपोर्ट को ECIR (Enforcement Case Information Report) कहा जाता है।
CBI से ख़तरनाक क्यों है ED?
के तहत विनिमय नियंत्रण कानूनों के उल्लंघन को रोकना था। आसान शब्दों में कहें तो, इसका काम यह देखना था कि देश से विदेशी मुद्रा बाहर न जाए और विदेशी मुद्रा से जुड़े कानूनों का पालन हो। तब तक ED को इतना गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था।
कैसे दो शहरों से देशभर में फैला जाल?
शुरुआत में बॉम्बे और कलकत्ता (अब मुंबई और कोलकाता) में ही इसके दफ्तर थे। लेकिन आज इसका जाल पूरे देश में फैल चुका है। साल 1960 में इसके प्रशासनिक नियंत्रण को आर्थिक मामलों के विभाग से राजस्व विभाग में स्थानांतरित कर दिया गया, और तब से यह इसी विभाग का हिस्सा है। यहां से इसकी शक्तियों में थोड़ा सा इजाफा हो गया।
अटल सरकार ने ED को दिया ब्रह्मास्त्र
साल 1999 की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम 1999 (FEMA) पारित किया। इस कानून ने ED के आधार को और मजूबत किया। लेकिन अब भी वह इतनी पॉवरफुल नहीं थी कि सियासी रसूखदारों पर सीधी कार्रवाई कर सके। लेकिन 3 साल बाद ही सरकार ने ‘धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA)’ पारित करते हुए ED को ‘ब्रह्मास्त्र’ दे दिया।
PMLA क्यों बनाता ED को सुपरपॉवर?
ED के सामने इकबालिया बयान: यह ED की सबसे बड़ी ताकत है। सामान्य पुलिस केस में, पुलिस के सामने दिया गया आरोपी का बयान कोर्ट में सबूत नहीं माना जाता। लेकिन PMLA की धारा 50 के तहत, ED अधिकारी के सामने दिया गया बयान कोर्ट में सबूत (Admissible Evidence) माना जाता है। यानी, अगर आरोपी ने पूछताछ में गुनाह कबूल कर लिया, तो वह कोर्ट में उसके खिलाफ इस्तेमाल होगा।
संपत्ति जब्त करने का अधिकार: ED के पास किसी भी ऐसी संपत्ति को अटैच (कुर्क) करने का अधिकार है, जिसके बारे में उसे संदेह है कि वह अपराध की कमाई (Proceeds of Crime) से बनाई गई है। खास बात यह है कि संपत्ति जब्त करने के लिए ED को कोर्ट में दोष साबित होने का इंतजार नहीं करना पड़ता। जांच के दौरान ही संपत्ति जब्त की जा सकती है।
गिरफ्तारी का अधिकार और जमानत: PMLA के तहत ED को गिरफ्तारी के व्यापक अधिकार मिले हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि PMLA के मामलों में जमानत मिलना बेहद मुश्किल होता है। इसमें दो शर्तें लागू होती हैं। पहली यह कि पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को जमानत का विरोध करने का मौका मिलना चाहिए। दूसरी यह कि कोर्ट को यह विश्वास होना चाहिए कि आरोपी निर्दोष है और जमानत पर रिहा होकर वह अपराध नहीं करेगा।
आपने कई बार यह देखा होगा कि ED अधिकारियों के शिकंजे में फंसे बड़े-बड़े मंत्री और नेता महीनों ही नहीं, बल्कि सालों तक जेल में रहते हैं। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंदे केजरीवाल को आबकारी नीति से जुड़े धन शोधन यानी मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में ED ने 21 मार्च 2024 को गिरफ्तार किया था। तमाम कानूनी दांवपेंच के बावजूद उन्हें 12 जुलाई को इस मामले में जमानत मिल सकती थी।
आरोपी के ऊपर सबूत का बोझ: आम आपराधिक मामलों में ‘निर्दोष जब तक कि दोषी साबित न हो’ (Innocent until proven guilty) का सिद्धांत चलता है और जांच एजेंसी को दोष साबित करना होता है। लेकिन PMLA के कुछ मामलों में ‘बर्डन ऑफ प्रूफ’ आरोपी पर होता है। यानी आरोपी को यह साबित करना पड़ता है कि उसका पैसा या संपत्ति वैध (White Money) है, न कि अवैध।
प्रवर्तन निदेशालय की शक्ति का विकास (इन्फोग्राफिक- AI)
2018 में मिल गई एक और बड़ी ताकत
साल 2018 में केंद्र की मोदी सरकार ने एक और कानून ‘भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 (FEOA) पारित किया। जिसका उद्देश आर्थिक अपराधियों को देश से भागने से रोकना था। इस कानून के तहत भगोड़े आर्थिक अपराधियों की संपत्तियों को जब्त करने की शक्ति भी मिल गई।
*खुफिया एजेंसी की तरह करती है काम*
ED एक खुफिया एजेंसी की तरह भी काम करती है और एक जांच एजेंसी की तरह भी। इसके काम करने का तरीका पुलिस या सीबीआई से थोड़ा अलग है। यह खुद सीधे तौर पर कोई FIR नहीं दर्ज करती है। लेकिन पुलिस या सीबीआई अगर कोई भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी या तस्करी का केस दर्ज करती है तो ED उस मामले का संज्ञान लेते हुए अपनी रिपोर्ट खुद दर्ज करती है। इस रिपोर्ट को ECIR (Enforcement Case Information Report) कहा जाता है।
*CBI से ख़तरनाक क्यों है ED?*
रिपोर्ट दर्ज करने के बाद ED मनी ट्रेल की तलाश करती है। दूसरी पुलिस या CBI भ्रष्टाचार की जांच करती है। जबकि ED उस भ्रष्टाचार से बनाई गई काली कमाई को कहां छिपाया गया, उसे ‘व्हाइट मनी’ कैसे बनाया गया इसकी खोज करती है। इसी तलाश के लिए वह छापेमारी और पूछताछ भी करती है।
*मुश्किल में फंसेंगी सीएम ममता बनर्जी?*
बात करें ED की कार्रवाई के बीच से सीएम ममता बनर्जी द्वारा फाइलों और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस को लेकर जाने के मामले की तो यह ममता बनर्जी पर भारी पड़ सकता है। हालांकि अब यह मामला कलकत्ता हाई कोर्ट पहुंच चुका है। दोनों ही तरफ से याचिकाएं दायर की गई हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, यह बात अब पूरी तरह अदालत पर निर्भर करती है कि वह क्या कुछ फैसला देती है। क्योंकि ममता बनर्जी ने भी ED पर चुनावी रणनीति और दस्तावेज जब्त करने का आरोप लगाया है। ऐसे में ममता को अदालत में यह साबित करना होगा कि जो दस्तावेज वो लेकर आई हैं वो चुनाव से जुड़े हैं। जबकि, ED को भी अदालत को भरोसा दिलाना होगा कि ममता बनर्जी जो फाइल्स लेकर गई हैं उनमें मनी ट्रेल के सुबूत हैं।