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शनिवार, 10 जनवरी 2026

चाईबासा में हाथी का तांडव और सिस्टम की हार : बेकाबू हाथी ने वनकर्मी समेत 3 को पटका, 9 दिनों में 22 मौतें

झारखंड: रक्षक ही असुरक्षित, तो जनता किसके भरोसे? चाईबासा में हाथी का तांडव और सिस्टम की हार : बेकाबू हाथी ने वनकर्मी समेत 3 को पटका, 9 दिनों में 22 मौतें


चाईबासा : पश्चिमी सिंहभूम के बेनीसागर में जंगली हाथी ने खूनी खेल जारी रखते हुए एक वन विभाग के कर्मचारी सहित तीन और लोगों की जान ले ली है। जिले में पिछले 9 दिनों के भीतर हाथियों के हमले में मरने वालों का आधिकारिक आंकड़ा अब 22 पहुंच गया है।

एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सरकारी तंत्र की विफलता का प्रमाण

चाईबासा के बेनीसागर से आई हालिया तस्वीर केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सरकारी तंत्र की विफलता का प्रमाण है। जब एक गजराज पूरे जिले को बंधक बना ले और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाला वन विभाग खुद अपने कर्मचारी को न बचा पाए, तो समझ लीजिए कि स्थिति ‘खतरे के निशान’ को पार कर चुकी है।

खोखली साबित हुई सुरक्षा की रणनीति

हाथियों को खदेड़ने के नाम पर हर साल करोड़ों का बजट खर्च होता है, लेकिन जमीन पर नतीजा क्या है? 9 दिनों में 22 मौतें! यह कोई साधारण आंकड़ा नहीं है, यह एक मानवीय त्रासदी है। वन विभाग अक्सर दावा करता है कि उनके पास ‘क्विक रिस्पांस टीम’ (QRT) है, लेकिन हकीकत यह है कि जब हाथी गांव में घुसता है, तो विभाग के पास केवल टॉर्च और पटाखों के अलावा कुछ नहीं होता।

जब ‘रक्षक’ ही लाचार है…

बेनीसागर की घटना ने वन विभाग की पोल खोल कर रख दी है। विभाग जो जनता को हाथियों से बचाने का वादा करता है, आज उसका अपना ही कर्मचारी हाथी के पैरों तले कुचल दिया गया। यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि जो विभाग सुरक्षा देने वाला है, वह आज खुद सबसे ज्यादा असुरक्षित है। जब विभाग अपने प्रशिक्षित कर्मियों को सुरक्षा उपकरण और सही ट्रेनिंग नहीं दे पा रहा, तो आम ग्रामीणों से यह उम्मीद करना कि वे खुद का बचाव कर लेंगे, बेईमानी है।

ओडिशा सीमा पर समन्वय का अभाव

ग्रामीणों की मानें तो हाथी बीती रात से ही झारखंड-ओडिशा सीमा पर मौत बांट रहा था। सवाल यह है कि जब हाथी की लोकेशन ट्रैकिंग की सुविधा उपलब्ध है, तो समय रहते गांवों को अलर्ट क्यों नहीं किया गया? क्यों प्रशासन तब जागता है जब लाशें सड़क पर बिछ जाती हैं?

मुआवजे से नहीं, समाधान से बचेगी जान

सरकार मौतों के बाद मुआवजे का मरहम लगा देती है, लेकिन क्या किसी की जान की कीमत चार लाख रुपये है? कोल्हान की जनता को मुआवजा नहीं, बल्कि हाथियों के आतंक से ‘मुक्ति’ चाहिए। हाथियों के कॉरिडोर की मैपिंग, ट्रेंकुलाइजिंग गन्स की उपलब्धता और हाथियों को रिहायशी इलाकों से दूर रखने के लिए सौर बाड़ (Solar Fencing) जैसे स्थायी समाधानों पर धूल जम रही है।

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