रांची के धुर्वा इलाके से लापता हुए अंश और अंशिका के चेहरे पर मुस्कान लौटने में पूरे 12 दिन लगे। इन 12 दिनों में न जाने कितनी रातें ऐसी रहीं, जब दोनों मासूम पुआल के बिस्तर पर एक दूसरे से सटकर सोते रहे। उन्हें शायद यह भी ठीक से समझ नहीं था कि वे अपने घर से इतनी दूर कैसे आ गए। झारखंड पुलिस उन्हें ढूंढने के लिए कई राज्यों में छापेमारी कर रही थी। हर थाने, हर चौकी में उनकी तस्वीरें पहुंच चुकी थीं। इस बीच दो छोटे बच्चे रामगढ़ के एक स्लम इलाके में ऐसे रह रहे थे, जैसे किसी और की दुनिया में आ गए हों।
मम्मी पापा कहने की मजबूरी
सूर्या और उसकी पत्नी सोनम उर्फ सोनी बच्चों के साथ ऐसे घुलमिल गए थे कि अंश और अंशिका उन्हें मम्मी पापा कहने लगे। यह शब्द उनके मुंह से मजबूरी में निकले या आदत में, यह अब भी सवाल है। आसपास के लोगों को कभी शक नहीं हुआ, क्योंकि बच्चों की हंसी और खेल सब कुछ सामान्य दिख रहा था। जब दंपत्ति काम पर निकलता, तो दोनों बच्चे मकान मालकिन रोशन आरा के घर में खेलते रहते। रोशन आरा के लिए वे सिर्फ दो मासूम बच्चे थे, जिन्हें घर की छत मिली हुई थी।
हजार रुपये किराया और एक झूठी कहानी
रोशन आरा बताती हैं कि सूर्या ने खुद को बिहार के औरंगाबाद का निवासी बताया था। कहा था कि अतिक्रमण अभियान में घर टूट गया, सिर छुपाने की कोई जगह नहीं बची। बच्चों का चेहरा देखकर उन्होंने ज्यादा सवाल नहीं किए। हजार रुपये महीने के किराए पर कमरा दे दिया। उन्हें क्या पता था कि यह कमरा किसी और के बच्चों की कैदगाह बन जाएगा।
कमरे के अंदर छुपा एक और सच
जब रामगढ़ एसपी अजय कुमार पुलिस टीम के साथ उस कमरे में पहुंचे, तो तस्वीर बदल गई। पुआल बिछा हुआ था, वहीं बच्चे सोते थे। एक कोने में रखा सूटकेस खुला तो उसमें बच्ची के कपड़ों के साथ कई आधार कार्ड मिले। अलग अलग नाम, अलग पहचान। उस एक सूटकेस ने कहानी को और गहरा बना दिया।
मासूमियत बनाम साजिश
अंश और अंशिका को शायद इन कागजों, इन झूठी पहचान और इस भागदौड़ की कोई समझ नहीं थी। उनके लिए दुनिया वहीं थी, जहां शाम को सूर्या लौटता था और सोनम उन्हें गोद में उठा लेती थी। लेकिन पुलिस के लिए यह बच्चों को छुपाने की एक सोची समझी साजिश थी।
अब सुरक्षित हैं, पर सवाल बाकी हैं
आज अंश और अंशिका सुरक्षित हैं। पुलिस की निगरानी में हैं और धीरे धीरे अपने असली घर की ओर लौट रहे हैं। लेकिन कई सवाल अब भी हवा में हैं। इतने आधार कार्ड क्यों थे, बच्चों को क्यों छुपाया गया, और इस कहानी में कौन कौन शामिल था। इन सवालों के जवाब जांच में मिल जाएंगे। फिलहाल राहत सिर्फ इतनी है कि दो मासूम अब पुआल के बिस्तर पर नहीं, बल्कि सुरक्षा की छांव में सो रहे हैं।











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