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गुरुवार, 15 जनवरी 2026

दरभंगा की अंतिम महारानी नहीं रही, 600 किलो सोना दान क्यों किया

बिहार : दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी अब इस दुनिया में नहीं रहीं। 94 वर्ष की उम्र में उनके निधन के साथ मिथिला की शाही परंपरा का अंतिम जीवंत अध्याय भी इतिहास बन गया। देश उन्हें सिर्फ एक महारानी के रूप में नहीं, बल्कि सच्चे त्याग, मौन राष्ट्रभक्ति और दान की मिसाल के तौर पर याद करेगा। शोर-शराबे से दूर कर्तव्य को धर्म मानकर जीने वाली कामसुंदरी देवी ने यह साबित किया कि सत्ता से बड़ी संवेदना होती है। वहीं, वैभव से बड़ा होता है बलिदान। उनका जाना एक व्यक्तित्व का नहीं, बल्कि एक युग का अवसान है, जो हमेशा भारतीय स्मृति में जीवित रहेगा। दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी अब स्मृतियों में हैं। बीते 12 जनवरी को उनके निधन के साथ मिथिला की शाही परंपरा का अंतिम जीवंत अध्याय भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। वे ऐसी महारानी थीं, जिनकी पहचान सत्ता के शोर से नहीं, कर्तव्य की मौन शक्ति से बनी। सार्वजनिक जीवन से भले ही वे अंतिम वर्षों में दूर रहीं, लेकिन बिहार और देश की सांस्कृतिक चेतना में उनका स्थान कभी फीका नहीं पड़ा। आज उन्हें सिर्फ एक महारानी नहीं, बल्कि त्याग, दान, मर्यादा, नेतृत्व और मौन राष्ट्रभक्ति के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।



महारानी कामसुंदरी देवी स्वर्गीय महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की धर्मपत्नी थीं। उस दौर में दरभंगा राजघराने में आईं

जब राजशाही ढलान पर थी और लोकतंत्र का सूरज उग रहा था, सत्ता में उनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं रही, लेकिन उन्होंने परंपरा, मर्यादा और सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरी गरिमा के साथ निभाया। वे उस मिथिला संस्कृति की प्रतिनिधि थीं, जहां शिक्षा, दान और लोककल्याण को ही राजधर्म माना जाता था। महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ दरभंगा राज की शाही परंपरा अब इतिहास की धरोहर बन गई है।

600 किलो सोने का त्याग: भारतीय इतिहास में महारानी कामसुंदरी देवी का नाम 1962 के भारत-चीन युद्ध से अमर हो गया। जब देश संसाधनों की कमी और राष्ट्रीय संकट से जूझ रहा था, तब दरभंगा राज की ओर से 600 किलोग्राम सोना भारत सरकार को दान किया गया। यह दान सिर्फ आर्थिक सहयोग नहीं था, बल्कि डगमगाते राष्ट्र के लिये नैतिक संबल भी था। एक ऐसी राष्ट्रभक्ति, जो बिना भाषण के अपने आप बोल उठी। शाही जीवन होने के बावजूद महारानी कामसुंदरी देवी ने सादगी को कभी नहीं छोड़ा। उनका जीवन मंत्र साफ था, “जिनके पास अधिक है, उनकी जिम्मेदारी भी अधिक है।” उन्होंने जीवनभर शिक्षा के संरक्षण के लिये, सामाजिक कल्याण के लिये और मिथिला की सांस्कृतिक अस्मिता के लिये काम किया।

कल्याणी फाउंडेशन और विरासत की रक्षा: महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन के माध्यम से उन्होंने दरभंगा राज की शैक्षणिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और संवर्धित किया। यह कार्य किसी राजाज्ञा से नहीं, बल्कि सेवा-भाव से उपजे संकल्प का परिणाम था।

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