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शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

प्रयागराज:3 जनवरी से प्रयागराज में माघ मेला, शाही स्नान की तिथियां तय - जानिए धार्मिक महत्व और पूरी जानकारी

प्रयागराज: नववर्ष की शुरुआत के साथ ही संगम नगरी प्रयागराज में आस्था का सबसे बड़ा आयोजन माघ मेला शुरू होने जा रहा है। इस वर्ष माघ मेले की शुरुआत 3 जनवरी 2026 (पौष पूर्णिमा) से होगी और यह 15 फरवरी 2026, महाशिवरात्रि तक चलेगा। मेले को लेकर श्रद्धालुओं में भारी उत्साह है, वहीं प्रशासन ने भी तैयारियां तेज कर दी हैं।


हर वर्ष माघ मास में आयोजित होने वाला यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, तपस्या, दान और सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार माघ मास अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। इस दौरान संगम में स्नान, दान और कल्पवास करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। पद्म पुराण और मत्स्य पुराण में भी माघ मेले का विशेष उल्लेख मिलता है।

देवताओं के स्नान की मान्यता: धार्मिक मान्यता है कि माघ मेले के दौरान देवता भी पृथ्वी पर आकर संगम में स्नान करते हैं। इसी कारण इस अवधि को कल्पवास का सर्वोत्तम समय माना जाता है। माघ मेला को कुंभ मेले का लघु रूप भी कहा जाता है। जिन वर्षों में कुंभ या अर्धकुंभ नहीं होता, उन वर्षों में भी माघ मेले का आयोजन अनिवार्य रूप से किया जाता है।

शाही स्नान का विशेष महत्व: गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम पर लगने वाले माघ मेले का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण आयोजन शाही स्नान होता है। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु पुण्य लाभ के लिए संगम में आस्था की डुबकी लगाते हैं।

शाही स्नान के दिन अखाड़ों के साधु-संत, नागा संन्यासी और महंत पारंपरिक शोभायात्रा के साथ संगम तट पर पहुंचते हैं। शंखनाद, ढोल-नगाड़ों और जयघोष के बीच होने वाला यह स्नान अत्यंत दिव्य और भव्य माना जाता है। शाही स्नान के बाद ही आम श्रद्धालुओं को स्नान की अनुमति मिलती है।

माघ मेले के प्रमुख स्नान पर्व

3 जनवरी 2026 – पौष पूर्णिमा (मेला व कल्पवास आरंभ)

14 जनवरी 2026 – मकर संक्रांति (शाही स्नान)

18 जनवरी 2026 – मौनी अमावस्या (शाही स्नान)

23 जनवरी 2026 – बसंत पंचमी (शाही स्नान)

1 फरवरी 2026 – माघी पूर्णिमा

15 फरवरी 2026 – महाशिवरात्रि (अंतिम स्नान व मेले का समापन)

माघ मेला श्रद्धा, साधना और सनातन संस्कृति का ऐसा संगम है, जहां हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु आकर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं और भारत की आध्यात्मिक विरासत को सजीव अनुभव करते हैं।

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