सराईकेला: हर साल एक जनवरी को जब देश नए साल की शुरुआत करता है, उसी दिन खरसावां की धरती अपने शहीदों को याद करती है। शहीद स्थल पर पसरा सन्नाटा, मौन श्रद्धांजलि देता हुआ भी बहुत कुछ कह जाता है। इसी खामोशी के बीच इस बार उम्मीद की आवाज सुनाई दी, जब सीएम हेमंत सोरेन खरसावां शहीद स्थल पहुंचे।
गार्ड ऑफ ऑनर नहीं, शहीदों के सामने नमन
हेलीपैड पर गार्ड ऑफ ऑनर की औपचारिकता से दूर सीएम सीधे शहीद स्थल पहुंचे। उन्होंने सिर झुकाकर उन लोगों को नमन किया, जिनके नाम इतिहास में दर्ज तो हैं, लेकिन पहचान अब तक अधूरी रही। यह पल केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि संवेदना और स्वीकार का संदेश था।
एक जनवरी, जो झारखंड के लिए शहीद दिवस है
सभा को संबोधित करते हुए सीएम ने कहा कि एक जनवरी दुनिया के लिए नया साल है, लेकिन झारखंड के आदिवासी, मूलवासी, किसान और मजदूरों के लिए यह शहीद दिवस है। जब बाकी देश जश्न मनाता है, तब यहां के लोग अपने शहीदों को याद कर उनकी कुर्बानी को नमन करते हैं। यही झारखंड की आत्मा है।
संघर्ष से बना इतिहास
सीएम ने याद दिलाया कि झारखंड का इतिहास संघर्ष और बलिदान से भरा है। जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए यहां के लोगों ने हर दौर में आवाज उठाई। खरसावां गोलीकांड उसी संघर्ष की एक दर्दनाक याद है, जब निर्दोष लोगों ने अपनी जान गंवाई।
अब शहीदों की होगी पहचान, मिलेगा सम्मान
सीएम ने भरोसा दिलाया कि खरसावां गोलीकांड के शहीद अब गुमनामी में नहीं रहेंगे। गुआ गोलीकांड की तरह यहां भी शहीदों की पहचान की जाएगी और उनके आश्रितों को सम्मान दिया जाएगा। इसके लिए राज्य सरकार एक कमेटी बनाएगी और न्यायिक जांच आयोग का गठन किया जाएगा, जिसमें रिटायर जजों को शामिल किया जाएगा।
सम्मान केवल शब्द नहीं होगा
सीएम ने कहा कि सरकार केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहेगी। शहीदों के परिजनों को सम्मान और उनका हक दिलाना सरकार की जिम्मेदारी है। मसौदा तैयार है और पूरी समझ के साथ इसे लागू किया जाएगा, ताकि किसी के साथ अन्याय न हो।
शोक से संकल्प तक
सभा में मौजूद जनप्रतिनिधियों ने भी खरसावां गोलीकांड को आजाद भारत के सबसे बड़े गोलीकांडों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि आजादी के कुछ ही महीनों बाद यह घटना घटी, जिसने आदिवासी समाज को गहरे जख्म दिए। तभी से एक जनवरी को यहां शोक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
एक जनवरी 1948 की सुबह खरसावां हाट बाजार में जुटी भीड़ अपने भविष्य को लेकर सवाल कर रही थी। तभी चली गोलियों ने कई घरों के चिराग बुझा दिए। उस दिन के बाद से यह धरती हर साल उन शहीदों को याद करती है, जिनकी कुर्बानी ने झारखंड की चेतना को दिशा दी। खरसावां आज भी गवाही देता है कि शहीदों की यादें कभी मिटती नहीं हैं। अब सरकार के इस कदम से उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में उन शहीदों के नाम, चेहरे और परिवार भी सम्मान के साथ सामने आएंगे।













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